क्रांति के लिए ख़ूनी लड़ाइयां ज़रूरी नहीं, क्रांति यानी अन्याय आधारित व्यवस्था में आमूल बदलाव

द वायर विशेष: साल 1929 में 8 अप्रैल को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय असेंबली में बम फेंका था. बम फेंकने के बाद उन्होंने गिरफ़्तारी दी और उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा चला. 6 जून, 1929 को दिल्ली के सेशन जज लियोनॉर्ड मिडिल्टन की अदालत में दिया गया भगत सिंह का ऐतिहासिक बयान… हमारे ऊपर गंभीर आरोप …

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अकादमिक स्वतंत्रता: निजी बनाम सार्वजनिक विश्वविद्यालय- अपूर्वानंद

प्रताप भानु मेहता के इस्तीफ़े के बाद हुई बहस के दौरान एक अध्यापक ने कहा कि निजी के मुक़ाबले सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में अधिक आज़ादी है. शायद वे सोचते हैं कि यहां अध्यापकों को उनकी सार्वजनिक गतिविधि के लिए कुलपति तम्बीह नहीं करते. पर इसकी वजह बस यह है कि इन विश्वविद्यालयों के क़ानून इसकी इजाज़त …

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देशभक्ति, देशद्रोह और चुटकुले ..-प्रियदर्शन,

जनरल जिया उल हक़ के पाकिस्तान में एक चुटकुला चलता था. वहां जनरल जिया उल हक़ की तस्वीर के साथ एक डाक टिकट जारी किया गया. कुछ दिन बाद शिकायत आई कि यह टिकट चिपकता ही नहीं है. इसके लिए जांच कमेटी बैठाई गई. कमेटी ने छह महीने बाद रिपोर्ट दी- लोग इसमें थूक उलटी …

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1974 में नरेंद्र मोदी ने आंदोलनजीवियों को सरकार के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतारा था…

द वायर स्टाफ नई दिल्लीः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को एक नया शब्द आंदोलनजीवी गढ़ा, जिसके अर्थ से उनका तात्पर्य ऐसे लोगों से है, जो विरोध प्रदर्शनों के बिना जीवित नहीं रह सकते. राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान मोदी ने आंदोलनकारियों को परजीवी भी कहा. मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में नागरिकता संशोधन …

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हज़ारों बेटियों को उजड़ने से बचाने वाली सुधा को बेटी से दूर क़ैद में कैसा लगता होगा…- विमल

बहुत दिनों बाद सुधा भारद्वाज जी के घर गया. फिलहाल फरीदाबाद स्थित उनके फ्लैट में उनकी बेटी रहती है. दो कमरों की छोटे से फ्लैट में घुसते ही सामने किताबों की अलमारी पर हाथ का बना सुधा जी का चेहरा नजर आया. मायशा ने बताया कि यह नानी है. कितना मिलता है मां-बेटी का चेहरा. उसकी …

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क्या भारत कट्टरता के मामले में पाकिस्तान बनने की राह पर है? – कृष्ण प्रताप सिंह

पाकिस्तान की लोकप्रिय कवयित्री फ़हमीदा रियाज़ की एक बहुपठित पुरानी कविता की पंक्तियां हैं: तुम बिल्कुल हम जैसे निकले, अब तक कहां छुपे थे भाई. वो मूरखता वो घामड़पन, जिसमें हमने सदी गंवाई, आख़िर पहुंची द्वार तुम्हारे… पिछले दिनों भारत और पाकिस्तान से दो ऐसी खबरें आईं, जिनसे एक बार फिर यह सवाल पूछा जाने लगा कि …

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‘टू मच डेमोक्रेसी’ में जनता कहां है – कृष्ण प्रताप सिंह

अगर आप भी उन करोड़ों देशवासियों में शामिल हैं, जिन्हें लगता है कि देश का लोकतंत्र उसके सत्ताधीशों की बुरी नजर का शिकार है और इस कारण लगातार हाशिये में जा रहा है तो आपके लिए एक इससे भी बुरी खबर है. यह कि नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा योजना आयोग की जगह बनाए गए नीति …

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आंदोलनकारी किसानों को गद्दार, खालिस्तानी बताने वाले कौन? – रवीश कुमार,

 किसान आंदोलन में आतंकवादी, खालिस्तानी, पाकिस्तानी होने के बयान अभी तक आए जा रहे हैं. इसी साल जनवरी में ठीक यही हो रहा था जब लाखों लोग नागरिकता कानून के विरोध में दिल्ली और देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शन कर रहे थे. बीजेपी के नेता, मंत्री, प्रवक्ता, कार्यकर्ता गोली मारने के नारे लगाने लगे …

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बिहार चुनाव : कांग्रेस से नुकसान, क्या कहता है गणित- मनोरंजन भारती

बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की सरकार ना बन पाने पर उसका सारा ठीकरा कांग्रेस पर फोड़ा जा रहा है. कांग्रेस को लेकर कहा जा रहा लिखा जा रहा है उसने महागठबंधन को नीचे की ओर खींचा है. इसलिए कांग्रेस के नजरिए से इस विधानसभा चुनाव के नतीजों का विश्लेषण करना जरूरी है. सबसे पहले …

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कैसे नरेंद्र मोदी ने बिहार चुनाव में नीतीश को निपटाने के चक्कर में तेजस्वी और चिराग को नेता बना दिया – मनीष कुमार,

भाजपा किसी सहयोगी के लिए अब भरोसे की पार्टी नहीं रही. और इसका पहला लक्ष्य अपने विरोधियों को धूल चटाने से अधिक अपने सहयोगी की राजनीतिक जमीन छीनना होता है. जनता दल यूनाइटेड से अधिक इस कटु सत्य को कोई नहीं जानता. बिहार के चुनाव परिणाम की हर जगह, हर व्यक्ति अपने तरह से विवेचना …

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