तो इंटरनेशनल ब्रोकर की मदद से कश्मीर लाए गए हैं यूरोपियन संघ के सांसद

रवीश कुमार इंटरनेशनल बिज़नेस ब्रोकर का कश्मीर से क्या लेना देना? भारत सरकार को कश्मीर के मामले में इंटरनेशनल ब्रोकर की ज़रूरत क्यों पड़ी? भारत आए यूरोपियन संघ के सांसदों को कश्मीर ले जाने की योजना जिस अज्ञात एनजीओ के ज़रिए तैयार हुई उसका नाम पता सब बाहर आ गया है. यह समझ से बाहर …

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शिक्षित बेरोजगार की बढ़ती तादाद की फिक्र कीजिए सरकार !

उच्च शिक्षा प्राप्त नौजवानों में बेरोजगारी दर दुनिया में मौजूद बेरोजगारी दर से बहुत ज्यादा है. महिलाओंं में बेरोजगारी पुरुषों की तुलना में लगभग तिगुना ज्यादा है. बेरोजगारी थामने के उपाय नहीं हुये तो हालात विस्फोटक हो सकते हैं. योगेंद्र यादव जिस वक्त हम हिन्दुस्तानी लोग विश्व के रंगमंच पर अपनी-अपनी उपलब्धियों की विजय-पताका फहराने …

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भगत सिंह द्वारा लिखा सबसे चर्चित लेख, मैं नास्तिक क्यों हूं?

यह 27 सितम्बर 1931 को लाहौर के अखबार ‘द पीपल’ में प्रकाशित हुआ  ‘भगत सिंह‘ एक ऐसा नाम जिसे सुनकर मन में देश प्रेम की भावना हिलोरें मारने लगे, इंकलाब की एक पैनी तलवार जो तमाम सामाजिक बाधाओं और पारिवारिक सम्बन्धों से ऊपर उठकर हवा में लहरा जाए। आज उसी शख्स का जन्मदिन है जिसने हिंदुस्तान की …

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गर्व है कि वीसी ने रोमिला थापर को बुलाकर कोरे कागज पर नाम लिख के दिखाने को नहीं कहा

ये हमारा नहीं आईने का दस्तूर है. दर्पण में वीसी सीवी ही नज़र आएगा. तभी वीसी को ख़्याल आया होगा. बगैर सीवी के वीसी बनना तो ठीक है लेकिन हमारी बादशाहत में उनकी सीवी कैसी होगी जिनकी हैसियत वीसी से भी ज़्यादा है. बस बादशाह-ए-जेएनयू को तलब हुई. प्रो. रोमिला थापर की सीवी मंगाई जाए. …

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एक डॉक्टर और उसका कश्मीर, एक पत्रकार और उसका हिन्दी प्रदेश

रवीश कुमार अचानक दरवाज़ा खुला और एक शख़्स सामने आकर खड़ा हो गया. कंधे पर आला लटका हुआ था. नाम बताने और फैन कहने के कुछ अधूरे वाक्यों के बीच वह फफक पड़ा. पल भर में संभाला, लेकिन तब तक आंखों से आंसू बाहर आ चुके थे. वह डॉक्टर होने की गरिमा बनाए रखना चाहता …

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अगर यह हिंदू राष्ट्र नहीं है तो और क्या है?

आसिम अली उदारवादी बौद्धिक जमात के लिए भारत भले ही अब तक हिंदू राष्ट्र न बना हो, लेकिन गलियों में घूमनेवाले हिंदुत्ववादियों के लिए यह एक हिंदू राष्ट्र है. इसके लक्षण भले छिपे हुए हों, लेकिन इसके समर्थक और पीड़ित, दोनों ही बहुत ही स्पष्ट तरीके से इसका अनुभव कर सकते हैं. जब लोग ‘हिंदू राष्ट्र’ …

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दुर्गाबाई देशमुख : अपने ‘बाल-विवाह’ को तोड़कर जो आजादी के आंदोलन की दिग्गज नेता बनीं

असहयोग आंदोलन पूरे देश में जोर-शोर से चल रहा था. महात्मा गांधी पूरे भारत में घूम-घूमकर लोगों को संबोधित कर रहे थे. दो अप्रैल, 1921 को महात्मा गांधी आंध्र प्रदेश के काकीनाड़ा में एक सभा करनेवाले थे. मुख्य कार्यक्रम वहां के टाउन हॉल में आयोजित होने वाला था. जब इस बारे में वहां के एक …

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‘लोग या तो डर के वोट दे रहे हैं, या ग़ुस्से में. और दोनों के लिए किसी फ़साद की ज़रूरत पड़ती है’

मशहूर साहित्यकार राही मासूम रज़ा के एक लेख का अंश अभी कुछ दिनों के लिए अमरीका जाना पड़ा. पतझड़ का मौसम था. अमरीकी राष्ट्रपति (रोनाल्ड) रीगन का पतझड़ भी मेरे ही सामने शुरू हो गया था. साहब ये अमरीकी राजनीति भी ग़ज़ब की चीज़ है. यह डॉलर के सिवा किसी की भी वफ़ादार नहीं…डॉलर की …

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